किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
मूल पाठ
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।
स्रोत अभिलेख 4.7 · पुस्तक पृ. 687, 690
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो लोग मित्रके दु:खसे दु:खी नहीं होते, उन्हें देखनेसे ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वतके समान दु:खको धूलके समान और मित्रके धूलके समान दु:खको सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 687 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
English explanation
AI draft: Those who do not grieve at a friend's suffering—even looking at them is a grave sin.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जो लोग | those who |
| न | नहीं | not |
| मित्र | मित्र के | a friend's |
| दुख | दुख में | in suffering |
| होहिं | होते हैं | become |
| दुखारी | दुखी | grieved |
| तिन्हहि | उन्हें ही | those very people |
| बिलोकत | देखते हुए | on looking at |
| पातक | पाप | sin |
| भारी | गंभीर | grave |
2 निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।
English explanation
One should regard one's own mountain-like sorrow as dust, and a friend's dust-like sorrow as Mount Meru.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपना | one's own |
| दुख | दुख | sorrow |
| गिरि | पर्वत | mountain |
| सम | के समान | like |
| रज | धूल | dust |
| करि | मानकर | taking as |
| जाना | समझे | should regard |
| मित्रक | मित्र का | a friend's |
| दुख | दुख | sorrow |
| रज | धूल-जितना | as small as dust |
| मेरु | मेरु पर्वत | Mount Meru |
| समाना | के समान | equal to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.7
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 687
- सहायक विषय
- सुग्रीवका दु:ख सुनाना, बालिवधकी प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-लक्षण-वर्णन · सुग्रीवका वैराग्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 687, 690
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।