किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दपपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजीका द्रोही सुख नहीं पाता (सुखके लिये झीखता रहता है)। शरद्-ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोंके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 699 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।
स्रोत अभिलेख 4.17 · पुस्तक पृ. 698, 699
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
English explanation
The rain-thirsting chataka keeps calling, intensely thirsty, just as one hostile to Shiva finds no happiness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चातक | चातक पक्षी | the rain-thirsting chataka bird |
| रटत | बार-बार पुकारता है | keeps calling |
| तृषा | प्यास | thirst |
| अति | अत्यधिक | intense |
| ओही | उसे | to it |
| जिमि | जैसे | just as |
| सुख | सुख | happiness |
| लहइ | पाता है | obtains |
| न | नहीं | not |
| संकरद्रोही | भगवान शंकर से द्वेष करने वाला | one hostile to Shiva |
2 सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।
English explanation
At night the moon removes autumn’s heat, just as sins depart through the sight of a saint.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सरदातप | शरद ऋतु की तपन | autumn’s heat |
| निसि | रात में | at night |
| ससि | चंद्रमा | the moon |
| अपहरई | दूर करता है | removes |
| संत | संत के | of a saint |
| दरस | दर्शन से | through seeing |
| जिमि | जैसे | just as |
| पातक | पाप | sins |
| टरई | दूर हो जाते हैं | pass away |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.17
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 699
- सहायक विषय
- शरद्-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 698, 699
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।