किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
मूल पाठ
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।
स्रोत अभिलेख 4.12 · पुस्तक पृ. 694, 694
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 694 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
English explanation
O Uma, no teacher, father, mother, brother, or master in the world is as caring as Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उमा | हे पार्वती | O Parvati, Shiva’s consort |
| राम | राम के | Rama |
| सम | समान | equal to |
| हित | हितकारी | a well-wisher |
| जग | संसार | the world |
| माहीं | में | in |
| गुरु | गुरु | teacher |
| पितु | पिता | father |
| मातु | माता | mother |
| बंधु | भाई या संबंधी | brother or kinsman |
| प्रभु | स्वामी | master |
| नाहीं | नहीं है | is not |
2 सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।
English explanation
Gods, humans, and sages all follow this way: all show affection for their own interests.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवता | gods |
| नर | मनुष्य | humans |
| मुनि | मुनि | sages |
| सब | सभी | all |
| कै | की | of |
| यह | यह | this |
| रीती | रीति | way |
| स्वारथ | अपने लाभ | self-interest |
| लागि | के लिए | for the sake of |
| करहिं | करते हैं | practice |
| सब | सभी | all |
| प्रीती | प्रेम | affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.12
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 694
- सहायक विषय
- ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी-द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक तथा अंगदको युवराजपद
- मुद्रित पृष्ठ
- 694, 694
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।