बालकाण्ड · दोहा 347 · दोहा/सोरठा
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.347 · पुस्तक पृ. 329, 329
भावार्थ और शब्दार्थ
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1होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
शुभ शकुन होते हैं; देवता दुंदुभियाँ बजाकर फूल बरसाते हैं।
English explanation
Auspicious omens occur; the gods shower flowers while sounding kettledrums.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होहिं | होते हैं | occur |
| सगुन | शुभ शकुन | auspicious omens |
| बरषहिं | बरसाते हैं | shower down |
| सुमन | फूल | flowers |
| सुर | देवता | the gods |
| दुंदुभीं | दुंदुभियाँ | kettledrums |
| बजाइ | बजाकर | sounding; having played |
2 बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।
देवताओं की स्त्रियाँ आनंदित होकर सुंदर मंगलगीत गाते हुए नाचती हैं।
English explanation
The gods' wives dance joyfully, singing beautiful auspicious songs.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबुध | देवताओं की | of the gods |
| बधू | पत्नियाँ | wives |
| नाचहिं | नाचती हैं | dance |
| मुदित | आनंदित होकर | joyfully |
| मंजुल | सुंदर | beautiful |
| मंगल | मंगलगीत | auspicious songs |
| गाइ | गाकर; गाते हुए | singing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 347
- स्रोत अभिलेख
- 1.347
- सहायक विषय
- बारातका अयोध्या लौटना और अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 329, 329
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