बालकाण्ड · दोहा 142 · दोहा/सोरठा
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.142 · पुस्तक पृ. 150, 150
भावार्थ और शब्दार्थ
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1होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
घर में रहते-रहते वृद्धावस्था आ गई, फिर भी विषय-भोगों से वैराग्य नहीं हुआ।
English explanation
While he continued living at home, old age arrived, yet detachment from sensual enjoyments did not arise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होइ | होता है | arises |
| न | नहीं | not |
| बिषय | इंद्रिय-भोगों से | from sensual enjoyments |
| बिराग | वैराग्य | detachment |
| भवन | घर में | at home |
| बसत | रहते हुए | while living |
| भा | आ गया | came |
| चौथपन | वृद्धावस्था | old age |
2 हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।
उनके हृदय में बहुत दुःख हुआ कि हरि की भक्ति के बिना जीवन बीत गया।
English explanation
His heart felt great sorrow that life had passed without devotion to Hari.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| बहुत | बहुत | great |
| दुख | दुःख | sorrow |
| लाग | अनुभव हुआ | was felt |
| जनम | जीवन | life |
| गयउ | बीत गया | passed away |
| हरिभगति | भगवान हरि की भक्ति | devotion to Lord Hari |
| बिनु | बिना | without |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 142
- स्रोत अभिलेख
- 1.142
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 150, 150
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