बालकाण्ड · दोहा 120 (क) · दोहा/सोरठा
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.12 · पुस्तक पृ. 131, 133
भावार्थ और शब्दार्थ
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1हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
तब कामदेव के शत्रु, स्वभाव से सुज्ञानी शंकर हृदय में हर्षित हुए।
English explanation
Then Shiva, the foe of the god of desire and wise by nature, rejoiced in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हिंयँ | हृदय में | in the heart |
| हरषे | हर्षित हुए | rejoiced |
| कामारि | कामदेव के शत्रु शिव | Shiva, foe of the god of desire |
| तब | तब | then |
| संकर | शिव | Shiva |
| सहज | स्वभाव से | by nature |
| सुजान | सुज्ञानी | wise and discerning |
2 बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
उमा की अनेक प्रकार से प्रशंसा करके फिर कृपा के भंडार शिव बोले।
English explanation
After praising Uma in many ways, Shiva, the treasure of compassion, spoke again.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहु | अनेक | many |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| उमहि | उमा की | Uma |
| प्रसंसि | प्रशंसा करके | having praised |
| पुनि | फिर | then; again |
| बोले | बोले | spoke |
| कृपानिधान | कृपा के भंडार शिव | Shiva, treasure of compassion |
| क | पद-संदर्भ का अक्षर ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 120 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.12
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद · अवतारके हेतु
- मुद्रित पृष्ठ
- 131, 133
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