बालकाण्ड · दोहा 119 · दोहा/सोरठा
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.119 · पुस्तक पृ. 131, 131
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बार-बार प्रभु शिव के चरणकमल पकड़कर और अपने कमल जैसे हाथ जोड़कर—
English explanation
Repeatedly clasping Lord Shiva's lotus feet and joining her lotus-like hands—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| प्रभु | प्रभु शिव के | of Lord Shiva |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल जैसे | lotus-like |
| गहि | पकड़कर | having clasped |
| जोरि | जोड़कर | having joined |
| पंकरुह | कमल जैसे | lotus-like |
| पानि | हाथ | hands |
2 बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।
गिरिजा ने ऐसे सुंदर वचन कहे, मानो वे प्रेम के रस में सने हुए हों।
English explanation
Girija spoke beautiful words, as though steeped in the essence of love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोली | बोलीं | spoke |
| गिरिजा | पर्वतराज की पुत्री पार्वती | Parvati, daughter of the mountain king |
| बचन | वचन | words |
| बर | सुंदर और उत्तम | beautiful and excellent |
| मनहुँ | मानो | as though |
| प्रेम | प्रेम के | of love |
| रस | रस में | in the essence |
| सानि | सने हुए | steeped |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 119
- स्रोत अभिलेख
- 1.119
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 131, 131
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