बालकाण्ड · दोहा 2 · दोहा/सोरठा
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
मूल पाठ
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
स्रोत अभिलेख 1.2 · पुस्तक पृ. 20, 21
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराजका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीरके रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष— चारों फल पा जाते हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 21 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
English explanation
Those who hear and understand, and bathe in it with joyful hearts and deep love—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| समुझहिं | समझते हैं | understand |
| जन | लोग | people |
| मुदित | प्रसन्न | joyful |
| मन | मन से | with hearts |
| मज्जहिं | स्नान करते हैं | bathe |
| अति | अत्यंत | deeply |
| अनुराग | प्रेम के साथ | with love |
2 लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
English explanation
While still living in this body, they obtain the four goals—righteousness, prosperity, desire’s fulfillment, and liberation—in the Prayag constituted by saintly company.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लहहिं | प्राप्त करते हैं | obtain |
| चारि | चार | four |
| फल | पुरुषार्थों के फल | goals of human life |
| अछत | रहते हुए | while still present |
| तनु | शरीर | the body |
| साधु | साधुओं का | of saints |
| समाज | समाज | company |
| प्रयाग | प्रयाग रूपी तीर्थ में | in the metaphorical Prayag |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 2
- स्रोत अभिलेख
- 1.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 21
- सहायक विषय
- ब्राह्मण-संत-वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 20, 21
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।