बालकाण्ड · दोहा 45 · दोहा/सोरठा
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.45 · पुस्तक पृ. 67, 68
भावार्थ और शब्दार्थ
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1संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
हे प्रभु, संत ऐसी नीति कहते हैं, और वेद, पुराण तथा मुनि भी इसका प्रतिपादन करते हैं:
English explanation
Lord, the saints state this principle, and the Vedas, Puranas, and sages proclaim it as well:
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संत | संतजन | saints |
| कहहि | कहते हैं | say |
| असि | ऐसी | such |
| नीति | नीति | principle |
| प्रभु | हे प्रभु | O lord |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| पुरान | पुराण | the Puranas |
| मुनि | मुनिजन | sages |
| गाव | गाते या प्रतिपादित करते हैं | proclaim |
2 होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
गुरु से बात छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक उत्पन्न नहीं होता।
English explanation
Pure discernment does not arise in the heart when one conceals things from one's teacher.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होइ | उत्पन्न होता है | arises |
| न | नहीं | not |
| बिमल | निर्मल | pure |
| बिबेक | विवेक | discernment |
| उर | हृदय में | in the heart |
| गुर | गुरु | one's teacher |
| सन | से | from |
| किएँ | करने पर | when practiced |
| दुराव | छिपाव | concealment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 45
- स्रोत अभिलेख
- 1.45
- सहायक विषय
- याज्ञवल्क्य-भरद्वाज-संवाद तथा प्रयाग-माहात्म्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 67, 68
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