बालकाण्ड · दोहा 117 · दोहा/सोरठा
रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.117 · पुस्तक पृ. 129, 130
भावार्थ और शब्दार्थ
1रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
जैसे सीप में चाँदी का आभास होता है और सूर्य की किरणों में जल का। ‘मास’ संदिग्ध है; यह अनुवाद संभावित ‘भास’ के आधार पर है।
English explanation
As silver appears in a shell, and water in the sun's rays. ‘मास’ is uncertain; this translation assumes the likely intended ‘भास’, appearance.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रजत | चाँदी | silver |
| सीप | सीप | a shell |
| महुँ | में | in |
| मास | संभवतः आभास | probably appearance |
| जिमि | जैसे | just as |
| जथा | जिस प्रकार | as |
| भानु | सूर्य की | of the sun |
| कर | किरणों में | in the rays |
| बारि | जल | water |
2 जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।
यद्यपि वह तीनों कालों में मिथ्या है, फिर भी उस भ्रम को कोई दूर नहीं कर सकता।
English explanation
Although it is false in all three times—past, present, and future—no one can dispel that illusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जदपि | यद्यपि | although |
| मृषा | मिथ्या | false; unreal |
| तिहुँ | तीनों | all three |
| काल | कालों में | times |
| सोइ | वही | that very |
| भ्रम | भ्रम | illusion |
| न | नहीं | not |
| सकइ | सकता है | can |
| कोउ | कोई | anyone |
| टारि | दूर करना | dispel |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 117
- स्रोत अभिलेख
- 1.117
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 129, 130
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।