बालकाण्ड · दोहा 307 · दोहा/सोरठा
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.307 · पुस्तक पृ. 289, 289
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
जब राजा दशरथ ने मुनि को अपने पुत्रों के साथ आते देखा—
English explanation
When King Dasharatha saw the sage approaching with his sons—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भूप | राजा दशरथ ने | King Dasharatha |
| बिलोके | देखा | saw |
| जबहिं | जैसे ही | as soon as |
| मुनि | मुनि विश्वामित्र को | the sage Vishvamitra |
| आवत | आते हुए | approaching |
| सुतन्ह | पुत्रों, राम और लक्ष्मण, के | his sons, Rama and Lakshmana |
| समेत | साथ | together with |
2 उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
वे प्रसन्न होकर उठे और चले, मानो सुख के समुद्र में उसकी थाह लेते हुए आगे बढ़ रहे हों।
English explanation
He rose joyfully and advanced, as though feeling his way through an ocean of happiness and sounding its depths.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उठे | उठे | rose |
| हरषि | प्रसन्न होकर | joyfully |
| सुखसिंधु | सुख के समुद्र | the ocean of happiness |
| महुँ | में | in |
| चले | आगे बढ़े | advanced |
| थाह | गहराई | depth |
| सी | मानो | as if |
| लेत | लेते हुए; टटोलते हुए | taking; sounding |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 307
- स्रोत अभिलेख
- 1.307
- सहायक विषय
- बारातका जनकपुरमें आना और स्वागतादि
- मुद्रित पृष्ठ
- 289, 289
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