बालकाण्ड · दोहा 50 · दोहा/सोरठा
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.5 · पुस्तक पृ. 71, 72
भावार्थ और शब्दार्थ
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1ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
जो ब्रह्म सर्वव्यापी, निर्मल, अजन्मा, अविभाज्य, इच्छारहित और भेदरहित है—
English explanation
Brahman, which is all-pervading, unstained, unborn, without parts, desireless, and without distinctions—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ब्रह्म | परम तत्त्व ब्रह्म | Brahman, the ultimate reality |
| जो | जो | which |
| व्यापक | सर्वत्र व्याप्त | all-pervading |
| बिरज | निर्मल; मलरहित | unstained; pure |
| अज | अजन्मा | unborn |
| अकल | कलाओं या अवयवों से रहित | without parts |
| अनीह | इच्छा या चेष्टा से रहित | without desire or striving |
| अभेद | भेदरहित | without distinctions |
2 सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।
क्या वही ब्रह्म, जिसे वेद भी नहीं जान पाते, शरीर धारण करके मनुष्य बन सकता है?
English explanation
Can that very Brahman, which even the Vedas do not know, assume a body and become a human?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वही ब्रह्म | that very Brahman |
| कि | क्या | can; whether |
| देह | शरीर | a body |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| होइ | बन जाए; हो जाए | become |
| नर | मनुष्य | a human |
| जाहि | जिस ब्रह्म को | which Brahman |
| न | नहीं | not |
| जानत | जानते हैं | know |
| वेद | वेद; वैदिक शास्त्र | the Vedas, the sacred scriptures |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 50
- स्रोत अभिलेख
- 1.5
- सहायक विषय
- सतीका भ्रम, श्रीरामजीका ऐश्वर्य और सतीका खेद
- मुद्रित पृष्ठ
- 71, 72
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।