बालकाण्ड · दोहा 148 · दोहा/सोरठा
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.148 · पुस्तक पृ. 155, 155
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
फिर कृपा के भंडार प्रभु बोले, “मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर…”
English explanation
Then the Lord, the treasury of grace, said, “Knowing me to be exceedingly pleased…”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोले | बोले | said |
| कृपानिधान | कृपा के भंडार; प्रभु | treasury of grace; the Lord |
| पुनि | फिर | then |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| मोहि | मुझे | me |
| जानि | जानकर | knowing |
2 मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
“मुझे महान दाता समझकर वह वर माँगो जो तुम्हारे मन को भाए।”
English explanation
“Considering me a great giver, ask for whatever boon pleases your heart.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मागहु | माँगो | ask for |
| बर | वरदान | a boon |
| जोइ | जो भी | whatever |
| भाव | भाए; पसंद आए | pleases |
| मन | मन को | your heart |
| महादानि | महान दाता | a great giver |
| अनुमानि | समझकर; मानकर | considering; regarding |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 148
- स्रोत अभिलेख
- 1.148
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 155, 155
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