बालकाण्ड · दोहा 149 · दोहा/सोरठा
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.149 · पुस्तक पृ. 155, 156
भावार्थ और शब्दार्थ
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1दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
हे दानियों के शिरोमणि, कृपा के भंडार, हे नाथ, मैं सच्चे भाव से कहता हूँ।
English explanation
O foremost of givers, treasure of compassion, O Lord, I speak with sincerity.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दानि | दानियों में | among givers |
| सिरोमनि | सर्वश्रेष्ठ | the foremost |
| कृपानिधि | हे कृपा के भंडार | O treasure of compassion |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I say |
| सतिभाउ | सच्चे भाव से | with sincerity |
2 चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ; प्रभु से क्या छिपाना?
English explanation
I desire a son like you; what is there to hide from the Lord?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चाहउँ | मैं चाहता हूँ | I desire |
| तुम्हहि | आपके | you |
| समान | समान | like |
| सुत | पुत्र | a son |
| प्रभु | प्रभु | the Lord |
| सन | से | from |
| कवन | क्या | what |
| दुराउ | छिपाव | concealment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 149
- स्रोत अभिलेख
- 1.149
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 155, 156
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