बालकाण्ड · दोहा 344 · दोहा/सोरठा
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.344 · पुस्तक पृ. 326, 327
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
घर-घर विविध प्रकार के मंगल कलश सजाकर रखे गए।
English explanation
Auspicious ceremonial pots were decorated and arranged in various ways in every home.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबिध | विविध | various |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
| मंगल | मांगलिक | auspicious |
| कलस | कलश | ceremonial pots |
| गृह | घर | home |
| गृह | घर में | in every home |
| रचे | सजाकर रखे गए | were arranged |
| सँवारि | सँवारकर | having been decorated |
2 सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
ब्रह्मा आदि सभी देवता श्रीराम की नगरी देखकर उसकी शोभा को लालसा-भरी प्रशंसा से निहारते हैं।
English explanation
All the gods, including Brahma, gaze upon Rama’s city with admiring envy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवता | gods |
| ब्रह्मादि | ब्रह्मा आदि | Brahma, the creator god, and others |
| सिहाहिं | लालसा-भरी प्रशंसा करते हैं | admire with longing or envy |
| सब | सभी | all |
| रघुबर | रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम की | of Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| पुरी | नगरी अयोध्या | the city of Ayodhya |
| निहारि | देखकर | having beheld |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 344
- स्रोत अभिलेख
- 1.344
- सहायक विषय
- बारातका अयोध्या लौटना और अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 326, 327
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