बालकाण्ड · दोहा 345 · दोहा/सोरठा
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.345 · पुस्तक पृ. 327, 328
भावार्थ और शब्दार्थ
1दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
उन्होंने गणेश और शिव की पूजा करके ब्राह्मणों को बहुत दान दिए।
English explanation
After worshipping Ganesha and Shiva, they gave abundant gifts to the Brahmins.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दिए | दिए | gave |
| दान | दान; उपहार | charitable gifts |
| बिप्रन्ह | ब्राह्मणों को | to the Brahmins |
| बिपुल | बहुत; प्रचुर | abundant |
| पूजि | पूजा करके | having worshipped |
| गनेस | गणेश की | Ganesha |
| पुरारी | त्रिपुर-विनाशक शिव की | Shiva, destroyer of Tripura |
2 प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
वे अत्यंत आनंदित थीं, मानो किसी निर्धन ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ पा लिए हों।
English explanation
They were supremely delighted, as though a poor person had attained all four aims of life: righteousness, prosperity, desire, and liberation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रमुदित | आनंदित | delighted |
| परम | अत्यंत | supremely |
| दरिद्र | निर्धन व्यक्ति | a poor person |
| जनु | मानो | as though |
| पाइ | पाकर | having attained |
| पदारथ | जीवन के पुरुषार्थ | the aims of life |
| चारि | चारों | all four |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 345
- स्रोत अभिलेख
- 1.345
- सहायक विषय
- बारातका अयोध्या लौटना और अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 327, 328
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