बालकाण्ड · दोहा 215 · दोहा/सोरठा
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.215 · पुस्तक पृ. 213, 213
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
अपने मन को प्रेम में डूबा जानकर राजा ने विवेक से काम लिया और धैर्य धारण किया।
English explanation
Recognizing that his mind was immersed in love, the king exercised discernment and regained composure.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रेम | प्रेम में | in love |
| मगन | डूबा हुआ | immersed |
| मनु | अपना मन | his mind |
| जानि | जानकर | recognizing |
| नृपु | राजा जनक ने | King Janaka |
| करि | करके / प्रयोग करके | exercising |
| बिबेकु | विवेक | discernment |
| धरि | धारण करके | maintaining |
| धीर | धैर्य | composure |
2 बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
मुनि के चरणों में सिर झुकाकर राजा भावावेश से रुंधी, गंभीर वाणी में बोले।
English explanation
Bowing his head at the sage’s feet, the king spoke in a deep voice choked with emotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोलेउ | बोले | spoke |
| मुनि | विश्वामित्र मुनि के | of the sage Vishvamitra |
| पद | चरणों में | at the feet |
| नाइ | झुकाकर | bowing |
| सिरु | सिर | his head |
| गदगद | भावावेश से रुंधी | choked with emotion |
| गिरा | वाणी में | in a voice |
| गभीर | गंभीर | deep and solemn |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 215
- स्रोत अभिलेख
- 1.215
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
- मुद्रित पृष्ठ
- 213, 213
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।