बालकाण्ड · दोहा 316 · दोहा
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
भूषित उडग़न तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.316 · पुस्तक पृ. 296, 297
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
घोड़ा चलते हुए ऐसी शोभा पा रहा है, मानो प्रभु के मन में ही पूर्णतः लीन हो।
English explanation
As the horse moves, it looks as though it is wholly absorbed in the Lord’s mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| मनसहिं | मन में ही | in the mind itself |
| लयलीन | पूर्णतः लीन | wholly absorbed |
| मनु | मानो | as though |
| चलत | चलते हुए | while moving |
| बाजि | घोड़ा | the horse |
| छबि | शोभा | splendor |
| पाव | पाता है | attains; displays |
2भूषित उडग़न तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६॥
मानो तारों और बिजली से सुशोभित मेघ किसी सुंदर मोर को नचा रहा हो।
English explanation
It is as though a cloud adorned with stars and lightning is making a splendid peacock dance.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भूषित | सुशोभित; सजा हुआ | adorned |
| उडग़न | तारों के समूह से | with a cluster of stars |
| तड़ित | बिजली से | with lightning |
| घनु | मेघ | a cloud |
| जनु | मानो | as though |
| बर | सुंदर; श्रेष्ठ | splendid; fine |
| बरहि | मोर को | a peacock |
| नचाव | नचाता है | makes dance |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा 316
- स्रोत अभिलेख
- 1.316
- सहायक विषय
- बारातका जनकपुरमें आना और स्वागतादि
- मुद्रित पृष्ठ
- 296, 297
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