बालकाण्ड · दोहा 17 · दोहा/सोरठा
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.17 · पुस्तक पृ. 39, 40
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
मैं पवनपुत्र हनुमान को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टों के वन को जलाने वाली अग्नि और ज्ञान की घनराशि हैं।
English explanation
I bow to Hanuman, son of the Wind, who is fire to the forest of the wicked and a rich store of wisdom.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रनवउँ | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow |
| पवनकुमार | पवनदेव के पुत्र हनुमान को | to Hanuman, son of the Wind god |
| खल | दुष्टों का | of the wicked |
| बन | वन | forest |
| पावक | अग्नि | fire |
| ग्यानधन | ज्ञान की घनराशि | rich store of wisdom |
2 जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
जिनके हृदय-रूपी घर में बाण और धनुष धारण किए राम निवास करते हैं।
English explanation
In the home of his heart dwells Rama, bearing arrows and a bow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिनके | whose |
| हृदय | हृदय | heart |
| आगार | घर में | in the dwelling |
| बसहिं | निवास करते हैं | dwells |
| राम | भगवान राम | Lord Rama |
| सर | बाण | arrows |
| चाप | धनुष | bow |
| धर | धारण करने वाले | bearing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 17
- स्रोत अभिलेख
- 1.17
- सहायक विषय
- श्रीसीताराम-धाम-परिकर-वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 39, 40
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।