बालकाण्ड · दोहा 66 · दोहा/सोरठा
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।।
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.66 · पुस्तक पृ. 84, 85
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।।
आप तीनों कालों के ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं; आपकी पहुँच सर्वत्र है।
English explanation
You know the past, present, and future and are all-knowing; your reach extends everywhere.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| त्रिकालग्य | भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता | knower of past, present, and future |
| सर्बग्य | सब कुछ जानने वाले | all-knowing |
| तुम्ह | आप | you |
| गति | पहुँच; गमन | reach; movement |
| सर्बत्र | हर जगह | everywhere |
| तुम्हारि | आपकी | your |
2 कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
हे श्रेष्ठ मुनि, हृदय में विचार करके मेरी पुत्री के दोष और गुण बताइए।
English explanation
O eminent sage, consider in your heart and tell me my daughter’s faults and virtues.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहहु | बताइए | please tell |
| सुता | पुत्री के | of the daughter |
| के | के | of |
| दोष | दोष | faults |
| गुन | गुण | virtues; good qualities |
| मुनिबर | हे श्रेष्ठ मुनि | O eminent sage |
| हृदयँ | हृदय में | in your heart |
| बिचारि | विचार करके | having considered |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 66
- स्रोत अभिलेख
- 1.66
- सहायक विषय
- पार्वतीका जन्म और तपस्या
- मुद्रित पृष्ठ
- 84, 85
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