बालकाण्ड · दोहा 108 · दोहा/सोरठा
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.108 · पुस्तक पृ. 121, 122
भावार्थ और शब्दार्थ
1जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
यदि वे राजा के पुत्र हैं, तो ब्रह्म कैसे हैं? और ब्रह्म हैं तो पत्नी के विरह में उनकी बुद्धि व्याकुल कैसे हुई?
English explanation
If he is a king’s son, how is he the Absolute? And if he is the Absolute, how was his mind bewildered by separation from his wife?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जौं | यदि | if |
| नृप | राजा के | of the king |
| तनय | पुत्र | son |
| त | तो | then |
| ब्रह्म | परम तत्त्व ब्रह्म | the Absolute |
| किमि | कैसे | how |
| नारि | पत्नी के | from his wife |
| बिरहँ | विरह में | in separation |
| मति | बुद्धि | mind |
| भोरि | व्याकुल; भ्रमित | bewildered |
2 देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
उनका आचरण देखकर और उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यंत भ्रमित हो जाती है।
English explanation
Seeing his conduct and hearing of his greatness, my understanding becomes deeply confused.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देख | देखकर | seeing |
| चरित | आचरण; लीलाएँ | conduct; deeds |
| महिमा | महिमा | greatness |
| सुनत | सुनकर | hearing |
| भ्रमति | भ्रमित होती है | becomes confused |
| बुद्धि | बुद्धि | understanding |
| अति | अत्यंत | deeply |
| मोरि | मेरी | my |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 108
- स्रोत अभिलेख
- 1.108
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 121, 122
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।