बालकाण्ड · दोहा 252 · दोहा/सोरठा
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.252 · पुस्तक पृ. 245, 245
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
राम के भय-संकोच से लक्ष्मण बोल नहीं पा रहे थे; जनक के वचन उन्हें बाणों जैसे लगे।
English explanation
Out of fear of Rama, Lakshmana could not speak; Janaka’s words struck him like arrows.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | बोल | speak |
| न | नहीं | not |
| सकत | सकते थे | could |
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम का | of Rama, hero of Raghu’s line |
| डर | भय; संकोच | fear; restraint |
| लगे | लगे; आकर चुभे | struck; felt |
| बचन | जनक के वचन | Janaka’s words |
| जनु | मानो | as though |
| बान | बाण | arrows |
2 नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।
राम के चरण-कमलों पर सिर झुकाकर लक्ष्मण उचित और सार्थक वाणी बोले।
English explanation
Bowing his head at Rama’s lotus feet, Lakshmana spoke fitting, weighty words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| राम | राम के | of Rama |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| सिरु | सिर | head |
| बोले | बोले | spoke |
| गिरा | वाणी; वचन | speech; words |
| प्रमान | उचित और सार्थक | fitting and weighty |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 252
- स्रोत अभिलेख
- 1.252
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 245, 245
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