बालकाण्ड · दोहा 4 · दोहा/सोरठा
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.4 · पुस्तक पृ. 23, 24
भावार्थ और शब्दार्थ
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1उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
तटस्थ व्यक्ति, शत्रु या मित्र—किसी का भी हित सुनकर दुष्ट जलते हैं; यही उनकी रीति है।
English explanation
The wicked burn with envy on hearing of anyone’s welfare—whether a neutral person, an enemy, or a friend; such is their way.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उदासीन | तटस्थ व्यक्ति | a neutral person |
| अरि | शत्रु | enemy |
| मीत | मित्र | friend |
| हित | भलाई | welfare |
| सुनत | सुनकर | on hearing |
| जरहिं | ईर्ष्या से जलते हैं | burn with envy |
| खल | दुष्टों की | of the wicked |
| रीति | रीति; स्वभाव | way; disposition |
2 जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
यह जानकर यह सेवक दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक विनती करता है।
English explanation
Knowing this, this servant joins both hands and makes a loving plea.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानि | जानकर | knowing this |
| पानि | हाथ | hands |
| जुग | दोनों; जोड़ा | both; a pair |
| जोरि | जोड़कर | joining |
| जन | सेवक; कवि स्वयं | the servant; the poet himself |
| बिनती | विनती | plea |
| करइ | करता है | makes |
| सप्रीति | प्रेमपूर्वक | with love |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 4
- स्रोत अभिलेख
- 1.4
- सहायक विषय
- खल-वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 23, 24
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