बालकाण्ड · दोहा 70 · दोहा/सोरठा
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.7 · पुस्तक पृ. 87, 88
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
ऐसा कहकर नारद ने हरि का स्मरण किया और पार्वती को आशीर्वाद दिया।
English explanation
Having said this, Narada remembered Hari and gave Parvati his blessing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| कहि | कहकर | having said |
| नारद | देवर्षि नारद | Narada, the divine sage |
| सुमिरि | स्मरण करके | having remembered |
| हरि | भगवान विष्णु | Lord Vishnu |
| गिरिजहि | पर्वतराज की पुत्री पार्वती को | to Parvati, daughter of the mountain king |
| दीन्हि | दिया | gave |
| असीस | आशीर्वाद | a blessing |
2 होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
हे पर्वतराज, यह कल्याण होगा; अब संशय छोड़ दो।
English explanation
O king of mountains, this auspicious outcome will come to pass; now abandon your doubts.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होइहि | होगा | will come to pass |
| यह | यह | this |
| कल्यान | मंगलमय परिणाम | auspicious outcome |
| अब | अब | now |
| संसय | संदेह | doubt |
| तजहु | छोड़ दो | abandon |
| गिरीस | हे पर्वतराज हिमवान | O Himavan, king of mountains |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 70
- स्रोत अभिलेख
- 1.7
- सहायक विषय
- पार्वतीका जन्म और तपस्या
- मुद्रित पृष्ठ
- 87, 88
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