बालकाण्ड · दोहा 43 (ख) · दोहा/सोरठा
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.43 · पुस्तक पृ. 65, 66
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
अब राम के चरण-कमलों को हृदय में धारण करके और उनकी कृपा पाकर—
English explanation
Now, holding Rama's lotus feet in my heart and receiving his grace—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम के | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| पद | चरण | feet |
| पंकरुह | कमल | lotuses |
| हियँ | हृदय में | in the heart |
| धरि | धारण करके | having held |
| पाइ | पाकर | having received |
| प्रसाद | कृपा; अनुग्रह | grace; favor |
2 कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
मैं दो श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुंदर संवाद कहता हूँ।
English explanation
I tell the lovely dialogue at the meeting of the two eminent sages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I tell |
| जुगल | दो; दोनों | two; both |
| मुनिबर्ज | श्रेष्ठ मुनियों | eminent sages |
| कर | के | of |
| मिलन | मिलन; भेंट | meeting |
| सुभग | सुंदर; मनोहर | lovely |
| संबाद | संवाद | dialogue |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 43 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 1.43
- सहायक विषय
- मानसका रूप और माहात्म्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 65, 66
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