बालकाण्ड · दोहा 43 (क) · दोहा/सोरठा
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.43 · पुस्तक पृ. 65, 66
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
अपनी बुद्धि के अनुसार इस उत्तम जल के गुण गिनकर और इसमें मन को नहलाकर—
English explanation
Having recounted the qualities of this fine water according to his understanding and bathed his mind in it—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मति | अपनी बुद्धि | one's understanding |
| अनुहारि | के अनुसार | according to |
| सुबारि | उत्तम जल के | of the fine water |
| गुन | गुण | qualities |
| गनि | गिनकर; वर्णन करके | enumerating; recounting |
| मन | मन को | the mind |
| अन्हवाइ | नहलाकर | having bathed |
2 सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।
भवानी और शंकर का स्मरण करके कवि सुंदर कथा कहता है।
English explanation
Remembering Bhavani and Shiva, the poet tells the lovely story.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरि | स्मरण करके | having remembered |
| भवानी | देवी पार्वती का | Goddess Parvati |
| संकरहि | शंकर, भगवान शिव का | Lord Shiva |
| कह | कहता है | tells |
| कबि | कवि | the poet |
| कथा | कथा | story |
| सुहाइ | सुंदर; मनोहर | lovely |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 43 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.43
- सहायक विषय
- मानसका रूप और माहात्म्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 65, 66
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