बालकाण्ड · छंद · छंद
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।
मूल पाठ
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।
निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
स्रोत अभिलेख 1.32 · पुस्तक पृ. 301, 301
भावार्थ
मूल पाठ के बादमण्डपको देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरतासे मुनियोंके मन भी हरे गये (मोहित हो गये)। सुजान जनकजीने अपने हाथोंसे ला-लाकर सबके लिये सिं हासन रखे। उन्होंने अपने कुलके इष्टदेवताके समान वसिष्ठजीकी पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजीकी पूजा करते समयकी परम प्रीतिकी रीति तो कहते ही नहीं बनती।
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 301 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।
English explanation
AI draft: On seeing the pavilion with its remarkable design, the sages were captivated by its beauty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मंडपु | विवाह-मंडप | wedding pavilion |
| बिलोकि | देखकर | having seen |
| बिचित्र | अद्भुत, विविध कलात्मक | remarkable and intricately varied |
| रचनाँ | बनावट, रचना | design; construction |
| रुचिरताँ | सुंदरता | beauty |
| मुनि | मुनियों के | of the sages |
| मन | मन | hearts; minds |
| हरे | मोह लिए | captivated |
2निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥
English explanation
The discerning King Janaka personally brought and placed seats of honor for everyone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | his own |
| पानि | हाथों से | with his hands |
| जनक | सीता के पिता राजा जनक | King Janaka, Sita’s father |
| सुजान | विवेकशील, समझदार | discerning; wise |
| सब | सभी | everyone |
| कहुँ | के लिए | for |
| आनि | लाकर | having brought |
| सिंघासन | सिंहासन, सम्मानित आसन | thrones; seats of honor |
| धरे | रख दिए | placed |
3कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
English explanation
Janaka honored Vashishtha as he would his family’s chosen deity and humbly received his blessing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कुल | कुल के | of the family |
| इष्ट | इष्टदेव | chosen deity |
| सरिस | के समान | like; as |
| बसिष्ट | रघुकुल के गुरु वसिष्ठ को | Vashishtha, preceptor of Raghu’s lineage |
| पूजे | पूजा की | honored; worshipped |
| बिनय | विनम्र निवेदन | humble entreaty |
| करि | करके | having made |
| आसिष | आशीर्वाद | blessing |
| लही | प्राप्त किया | received |
4कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
English explanation
The manner of Janaka’s profound love while honoring Vishvamitra cannot be put into words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कौसिकहि | कुशिकवंशी विश्वामित्र को | Vishvamitra, descendant of Kushika |
| पूजत | पूजा करते समय | while honoring |
| परम | अत्यंत गहरी | supreme; profound |
| प्रीति | प्रेम | love |
| कि | की | of |
| रीति | रीति, ढंग | manner; expression |
| तौ | तो | indeed; as for |
| न | नहीं | not |
| परै | संभव होती | is possible |
| कही | कही जाना | to be expressed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 1.32
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 301
- सहायक विषय
- बारातका जनकपुरमें आना और स्वागतादि
- मुद्रित पृष्ठ
- 301, 301
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।