बालकाण्ड · दोहा 320 · दोहा
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ ३२०॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.32 · पुस्तक पृ. 301, 301
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
प्रसन्न राजा जनक ने वामदेव आदि ऋषियों की पूजा की।
English explanation
The joyful King Janaka honored Vamadeva and the other sages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बामदेव | ऋषि वामदेव | the sage Vamadeva |
| आदिक | आदि, और अन्य | and others |
| रिषय | ऋषियों को | the sages |
| पूजे | पूजा की | honored; worshipped |
| मुदित | प्रसन्न | joyful |
| महीस | राजा जनक | the king, Janaka |
2दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ ३२०॥
उन्होंने सभी को दिव्य आसन दिए और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया।
English explanation
He provided splendid seats for everyone and received blessings from them all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दिए | दिए | gave; provided |
| दिब्य | दिव्य, अत्यंत सुंदर | splendid; exquisite |
| आसन | बैठने के आसन | seats |
| सबहि | सभी को | to everyone |
| सब | सब | all |
| सन | से | from |
| लही | प्राप्त किया | received |
| असीस | आशीर्वाद | blessings |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा 320
- स्रोत अभिलेख
- 1.32
- सहायक विषय
- बारातका जनकपुरमें आना और स्वागतादि
- मुद्रित पृष्ठ
- 301, 301
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