बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[उनके डरसे] कहीं भी शुभ आचरण (ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि) नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरुको कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो स्वप्रमें भी सुननेको नहीं मिलते थे॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 184 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
स्रोत अभिलेख 1.183 · पुस्तक पृ. 183, 184
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
English explanation
Good conduct is found nowhere; gods, Brahmins, and teachers receive no respect.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुभ | शुभ | good |
| आचरन | आचरण | conduct |
| कतहुँ | कहीं भी | anywhere |
| नहिं | नहीं | not |
| होई | होता है | occurs |
| देव | देवताओं का | for the gods |
| बिप्र | ब्राह्मणों का | for Brahmins |
| गुरू | गुरुओं का | for teachers |
| मान | सम्मान | respect |
| न | नहीं | no |
| कोई | कोई भी | any |
2 नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
English explanation
There is no devotion to Hari, sacrifice, austerity, or spiritual knowledge; the Vedas and Puranas are not heard even in dreams.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नहिं | नहीं है | there is no |
| हरिभगति | भगवान हरि की भक्ति | devotion to Lord Hari |
| जग्य | यज्ञ | ritual sacrifice |
| तप | तपस्या | austerity |
| ग्याना | आध्यात्मिक ज्ञान | spiritual knowledge |
| सपनेहुँ | सपने में भी | even in dreams |
| सुनिअ | सुनने को मिलते | are heard |
| न | नहीं | not |
| बेद | वेद | the Vedas |
| पुराना | पुराण | the Puranas |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.183
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 184
- सहायक विषय
- रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
- मुद्रित पृष्ठ
- 183, 184
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।