बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
मूल पाठ
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.151 · पुस्तक पृ. 157, 158
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[रानीकी] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपाके समुद्र भगवान् कोमल वचन बोले—तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 157 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
English explanation
AI draft: Hearing the gentle, profound, beautiful and excellent expression, the Lord, ocean of grace, spoke gentle words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनु | सुनो; प्रसंग में सुनकर | listen; contextually, having heard |
| मृदु | कोमल | gentle |
| गूढ़ | गहरे अर्थ वाली | profound |
| रुचिर | सुंदर | beautiful |
| बर | श्रेष्ठ | excellent |
| रचना | वचनों की रचना | expression in words |
| कृपासिंधु | कृपा के सागर भगवान | the Lord, ocean of grace |
| बोले | बोले | spoke |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बचना | वचन | words |
2 जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।।
English explanation
Whatever you desire in your heart, I have granted it all; there is no doubt.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो | whatever |
| कछु | कुछ | anything |
| रुचि | इच्छा | desire |
| तुम्हेर | तुम्हारे | your |
| मन | मन | heart |
| माहीं | में | within |
| मैं | मैंने | I |
| सो | वह | that |
| दीन्ह | दे दिया | have granted |
| सब | सब | all |
| संसय | संदेह | doubt |
| नाहीं | नहीं है | there is none |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.151
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 157
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 157, 158
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।