बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।
मूल पाठ
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।
स्रोत अभिलेख 1.232 · पुस्तक पृ. 227, 227
भावार्थ
मूल पाठ के बादनेत्रोंके रास्ते श्रीरामजीको हृदयमें लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजीने पलकोंके किवाड़ लगा दिये (अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियोंने सीताजीको प्रेमके वश जाना, तब वे मनमें सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 227 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।
English explanation
Wise Sita brought Rama into her heart through the pathway of her eyes, then closed the doors of her eyelids.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोचन | नेत्रों के | of her eyes |
| मग | मार्ग से | through the pathway |
| रामहि | राम को | Rama |
| उर | हृदय में | into her heart |
| आनी | ले आकर | having brought |
| दीन्हे | बंद कर दिए | closed |
| पलक | पलकरूपी | formed by her eyelids |
| कपाट | किवाड़ | doors |
| सयानी | समझदार सीता ने | wise Sita |
2 जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।
English explanation
When her companions realized that Sita was overcome by love, they felt bashful and could say nothing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जब | जब | when |
| सिय | सीता को | Sita |
| सखिन्ह | सखियों ने | her companions |
| प्रेमबस | प्रेम के वश में | overcome by love |
| जानी | समझा | recognized as |
| कहि | कह | say |
| न | नहीं | not |
| सकहिं | सकती हैं | can |
| कछु | कुछ भी | anything |
| मन | मन में | inwardly |
| सकुचानी | संकोच से भर गईं | felt bashful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.232
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 227
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 227, 227
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