बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।
मूल पाठ
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।
स्रोत अभिलेख 1.232 · पुस्तक पृ. 227, 227
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीरघुनाथजीकी छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गये। पलकोंने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेहके कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको चकोरी [बेसुध हुई] देख रही हो॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 227 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।
English explanation
Sita’s eyes became transfixed while gazing at Rama’s beauty; even her eyelids ceased to blink.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| थके | स्थिर हो गए | became transfixed |
| नयन | नेत्र | her eyes |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम की | of Rama, lord of Raghu’s lineage |
| छबि | सुंदर छवि | beauty |
| देखें | देखते हुए | while gazing at |
| पलकन्हिहूँ | पलकों ने भी | even her eyelids |
| परिहरीं | छोड़ दिया | gave up |
| निमेषें | झपकना | blinking |
2 अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।
English explanation
Overwhelming love left Sita oblivious to her body; she gazed as a female chakora gazes at the autumn moon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अधिक | अत्यधिक | intense |
| सनेहँ | प्रेम से | through love |
| देह | देह | her body |
| भै | हो गई | became |
| भोरी | सुध-बुध भूली हुई | lost in absorption |
| सरद | शरद ऋतु के | of autumn |
| ससिहि | चंद्रमा को | at the moon |
| जनु | मानो | as though |
| चितव | निहारती है | gazes |
| चकोरी | मादा चकोर पक्षी | a female chakora bird |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.232
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 227
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 227, 227
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।