बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरघुवंशियोंका यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [जाग्रत्की कौन कहे] स्वप्नमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 226 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।
स्रोत अभिलेख 1.231 · पुस्तक पृ. 226, 227
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।
English explanation
It is the natural disposition of Raghu’s descendants that their hearts never set foot on a wrongful path.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुबंसिन्ह | रघुवंशियों | Raghu’s descendants |
| कर | का | of |
| सहज | सहज | natural |
| सुभाऊ | स्वभाव | disposition |
| मनु | मन | heart |
| कुपंथ | बुरे मार्ग पर | on a wrongful path |
| पगु | पैर | foot |
| धरइ | रखता है | sets |
| न | नहीं | not |
| काऊ | कभी | ever |
2 मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।
English explanation
I have great trust in my heart, which has never looked upon another man’s wife even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझे | to me |
| अतिसय | बहुत अधिक | great |
| प्रतीति | विश्वास | trust |
| मन | अपने मन | my heart |
| केरी | का; यहाँ मन पर | in; relating to the heart |
| जेहिं | जिसने | which |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| परनारि | दूसरे की पत्नी | another man’s wife |
| न | नहीं | not |
| हेरी | देखी | looked upon |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.231
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 226
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 226, 227
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।