बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।
मूल पाठ
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.231 · पुस्तक पृ. 226, 227
भावार्थ
मूल पाठ के बादरणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे 'नाहीं नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 226 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।
English explanation
Those whose backs enemies never see in battle, and whose hearts and glances are never given to other men’s wives—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिन्ह | जिनकी | whose |
| कै | की | of |
| लहहिं | पाते हैं | find |
| न | नहीं | not |
| रिपु | शत्रु | enemies |
| रन | युद्ध में | in battle |
| पीठी | पीठ | backs |
| नहिं | नहीं | never |
| पावहिं | पाती हैं | receive |
| परतिय | दूसरों की पत्नियाँ | other men’s wives |
| मनु | मन | hearts |
| डीठी | दृष्टि | glances |
2 मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
English explanation
And from whom petitioners never receive a refusal—such noble men are few in the world.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मंगन | याचक | petitioners |
| लहहि | पाते हैं | receive |
| न | नहीं | not |
| जिन्ह | जिनकी ओर से | from whom |
| कै | का | of |
| नाहीं | ‘नहीं’, इनकार | a refusal |
| ते | वे | those |
| नरबर | श्रेष्ठ पुरुष | noble men |
| थोरे | थोड़े | few |
| जग | संसार | the world |
| माहीं | में | in |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.231
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 226
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 226, 227
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।