बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
मूल पाठ
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।।
स्रोत अभिलेख 1.357 · पुस्तक पृ. 337, 337
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनिकी कृपासे ही ईश्वरने तुम्हारी बहुत-सी बलाओंको टाल दिया। दोनों भाइयोंने यज्ञकी रखवाली करके गुरुजीके प्रसादसे सब विद्याएँ पायीं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 337 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
English explanation
AI draft: Dear son, I offer myself in admiration of you; this is the fruit of the sage’s grace. The remainder may refer to averting many difficulties, but the readings ‘ईस’ and ‘करवरें’ make its meaning uncertain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि की | of the sage |
| प्रसाद | कृपा से | through grace |
| बलि | बलिहारी जाता हूँ | I offer myself in admiration |
| तात | हे प्रिय पुत्र | dear son |
| तुम्हारी | तुम पर / तुम्हारी | to you / your |
| ईस | ईश्वर; संकट टालने वाले भगवान। | God; the Lord who averts dangers. |
| अनेक | बहुत-सी | many |
| करवरें | संकट; विपत्तियाँ या कठिन परिस्थितियाँ। | Dangers, troubles, or difficult situations. |
| टारी | टाल दीं | averted |
2 मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।।
English explanation
The two brothers protected the sacrifice and acquired all the disciplines through their teacher’s grace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मख | यज्ञ की | of the sacrifice |
| रखवारी | रक्षा | protection |
| करि | करके | having performed |
| दुहुँ | दोनों | both |
| भाई | भाइयों ने—राम और लक्ष्मण ने | brothers—Rama and Lakshmana |
| गुरु | गुरु की | of the teacher |
| प्रसाद | कृपा से | through grace |
| सब | सभी | all |
| बिद्या | विद्याएँ | disciplines and skills |
| पाई | प्राप्त कीं | acquired |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.357
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 337
- सहायक विषय
- बारातका अयोध्या लौटना और अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 337, 337
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।