बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दवे व्याकुल होकर मन-ही-मन मना रही हैं—हे महेश-भवानी! मुझपर प्रसन्न होइये, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिये और मुझपर स्नेह करके धनुषके भारीपनको हर लीजिये॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 249 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।
स्रोत अभिलेख 1.257 · पुस्तक पृ. 249, 249
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
English explanation
Distressed, Sita prays silently within: O Shiva and Parvati, be pleased.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मनहीं | मन में ही | within her mind alone |
| मन | मन में | inwardly |
| मनाव | प्रार्थना करके प्रसन्न करती हैं | prays to win favor |
| अकुलानी | व्याकुल होकर | in distress |
| होहु | होइए | be |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| महेस | हे शिव | O Shiva |
| भवानी | हे पार्वती | O Parvati |
2 करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।
English explanation
Let my service to you bear fruit; favor me by removing the bow's heaviness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करहु | कीजिए | make |
| सफल | फलदायी | fruitful |
| आपनि | आपकी | to you |
| सेवकाई | सेवा को | my service |
| करि | करके | by doing |
| हितु | मेरा हित | me a kindness |
| हरहु | दूर कीजिए | remove |
| चाप | धनुष का | the bow's |
| गरुआई | भारीपन | heaviness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.257
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 249
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 249, 249
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।