बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।
मूल पाठ
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।।
स्रोत अभिलेख 1.217 · पुस्तक पृ. 214, 215
भावार्थ
मूल पाठ के बादराजा बार-बार प्रभुको देखते हैं (दृष्टि वहाँसे हटना ही नहीं चाहती)। [प्रेमसे] शरीर पुलकित हो रहा है और हृदयमें बड़ा उत्साह है। [फिर] मुनिकी प्रशंसा करके और उनके चरणोंमें सिर नवाकर राजा उन्हें नगरमें लिवा चले॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 215 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।
English explanation
The king repeatedly gazes at Lord Rama; his body thrills and his heart overflows with eager joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| प्रभुहि | प्रभु राम को | at Lord Rama |
| चितव | देखते हैं | gazes |
| नरनाहू | राजा जनक | King Janaka |
| पुलक | रोमांचित | thrilling with joy |
| गात | शरीर | body |
| उर | हृदय में | in the heart |
| अधिक | बहुत | great |
| उछाहू | उत्साह | eager joy |
2 म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।।
English explanation
After praising the sage and bowing his head at his feet, the king set out toward the city, bringing them along.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| म्रुनिहि | मुनि की | the sage |
| प्रसंसि | प्रशंसा करके | having praised |
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| पद | चरणों में | at the feet |
| सीसू | सिर | his head |
| चलेउ | चले | set out |
| लवाइ | साथ ले जाकर | bringing them along |
| नगर | नगर की ओर | toward the city |
| अवनीसू | राजा जनक | King Janaka |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.217
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 215
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
- मुद्रित पृष्ठ
- 214, 215
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।