बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दइनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [वाणीसे] कही नहीं जा सकती। विदेह (जनकजी) आनन्दित होकर कहते हैं—हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 215 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।।
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।।
स्रोत अभिलेख 1.217 · पुस्तक पृ. 214, 215
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।।
English explanation
Their mutual love is pure and pleasing to the heart; it cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| इन्ह | इन दोनों की | of these two |
| कै | की | possessive marker |
| प्रीति | प्रेम | love |
| परसपर | एक-दूसरे के प्रति | toward each other |
| पावनि | पवित्र करने वाला | purifying |
| कहि | वर्णन किया | be described |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can be |
| मन | मन को | to the heart |
| भाव | भाने वाला | pleasing |
| सुहावनि | सुहावना | delightful |
2 सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।।
English explanation
The delighted Janaka said, “Listen, my lord: their natural affection is like that between Brahman and the individual soul.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनहु | सुनिए | listen |
| नाथ | हे नाथ, मुनि विश्वामित्र | O lord, sage Vishvamitra |
| कह | कहा | said |
| मुदित | प्रसन्न | delighted |
| बिदेहू | विदेह राजा जनक ने | Janaka, king of Videha |
| ब्रह्म | ब्रह्म, परम सत्य | Brahman, the ultimate reality |
| जीव | व्यक्तिगत आत्मा | the individual soul |
| इव | के समान | like |
| सहज | स्वाभाविक | natural |
| सनेहू | स्नेह | affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.217
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 215
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
- मुद्रित पृष्ठ
- 214, 215
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।