बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।
मूल पाठ
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई।।
स्रोत अभिलेख 1.286 · पुस्तक पृ. 272, 273
भावार्थ
मूल पाठ के बादजनकजीने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया [और कहा—] प्रभुहीकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयोंने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 273 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।
English explanation
Janaka bowed to Vishvamitra and said, ‘Master, by your grace Rama has broken the bow.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनक | राजा जनक | King Janaka |
| कीन्ह | किया | performed |
| कौसिकहि | विश्वामित्र को | to Vishvamitra |
| प्रनामा | प्रणाम | obeisance |
| प्रभु | हे प्रभु; विश्वामित्र के लिए संबोधन | O master; addressing Vishvamitra |
| प्रसाद | आपकी कृपा से | by your grace |
| धनु | धनुष | the bow |
| भंजेउ | तोड़ दिया | broke |
| रामा | राम ने | Rama |
2 मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई।।
English explanation
‘The two brothers have made me fulfilled. Now tell me what is proper, O master.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझे | me |
| कृतकृत्य | कृतार्थ; जिसका उद्देश्य पूरा हुआ | fulfilled; having attained one’s purpose |
| कीन्ह | कर दिया | have made |
| दुहुँ | दोनों | both |
| भाईं | भाइयों ने; राम और लक्ष्मण ने | brothers; Rama and Lakshmana as agents |
| अब | अब | now |
| जो | जो कुछ | whatever |
| उचित | उचित हो | is proper |
| सो | वह | that |
| कहिअ | कहिए; बताइए | please tell |
| गोसाई | हे स्वामी; विश्वामित्र | O master; Vishvamitra |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.286
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 273
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 272, 273
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।