बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।।
मूल पाठ
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।।
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
स्रोत अभिलेख 1.164 · पुस्तक पृ. 168, 168
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे दयासागर मुनि! आपके दर्शनसे ही चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मु_ीमें आ गये। तो भी स्वामीको प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर [क्यों न] शोकरहित हो जाऊँ॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 168 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।।
English explanation
O sage, ocean of compassion, through seeing you the four aims of life are within my grasp.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | हे कृपा के समुद्र | O ocean of compassion |
| मुनि | हे मुनि | O sage |
| दरसन | दर्शन से | through seeing |
| तोरें | आपके | you |
| चारि | चार | four |
| पदारथ | पुरुषार्थ | aims of life |
| करतल | हथेली में; सहज उपलब्ध | in the palm; within grasp |
| मोरें | मेरी | my |
2 प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
English explanation
Nevertheless, seeing you pleased, let me ask for a hard-to-obtain boon and become free from sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभुहि | आपको, हे प्रभु | you, my lord |
| तथापि | फिर भी | nevertheless |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| बिलोकी | देखकर | seeing |
| मागि | माँगकर | asking for |
| अगम | दुर्लभ | hard to obtain |
| बर | वरदान | boon |
| होउँ | मैं हो जाऊँ | may I become |
| असोकी | शोक रहित | free from sorrow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.164
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 168
- सहायक विषय
- प्रतापभानुकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 168, 168
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।