बालकाण्ड · दोहा 164 · दोहा/सोरठा
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.164 · पुस्तक पृ. 168, 168
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
मेरा शरीर बुढ़ापे, मृत्यु और दुख से रहित हो; युद्ध में कोई मुझे न जीत सके।
English explanation
May my body be free from old age, death, and suffering; may no one defeat me in battle.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जरा | बुढ़ापा | old age |
| मरन | मृत्यु | death |
| दुख | दुख | suffering |
| रहित | से रहित | free from |
| तनु | शरीर | body |
| समर | युद्ध में | in battle |
| जितै | मुझे जीत सके | may defeat me |
| जनि | न | not |
| कोउ | कोई | anyone |
2 एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
पृथ्वी पर मेरा शत्रुहीन, एकछत्र राज्य सौ कल्पों तक बना रहे।
English explanation
May my sole, unrivalled rule over the earth, free of enemies, endure for a hundred cosmic ages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एकछत्र | एकमात्र सार्वभौम | sole and sovereign |
| रिपुहीन | शत्रुओं से रहित | free of enemies |
| महि | पृथ्वी पर | over the earth |
| राज | राज्य | rule |
| कलप | कल्प, अत्यंत दीर्घ ब्रह्मांडीय काल | cosmic ages |
| सत | सौ | one hundred |
| होउ | हो; बना रहे | may it be; may it endure |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 164
- स्रोत अभिलेख
- 1.164
- सहायक विषय
- प्रतापभानुकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 168, 168
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