अयोध्याकाण्ड · सोरठा 301 · सोरठा
देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।
देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।
मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥ ३०१॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.301 · पुस्तक पृ. 595, 596
भावार्थ और शब्दार्थ
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1देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।
दोनों समाजों के सभी नर-नारियों को दुःखी और दीन देखकर—
English explanation
Seeing all the men and women of both assemblies sorrowful and helpless—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | having seen |
| दुखारी | दुःख से पीड़ित | afflicted with sorrow |
| दीन | दीन और असहाय | dejected and helpless |
| दुहु | दोनों | both |
| समाज | समाजों के | of the assemblies |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| सब | सभी | all |
2 मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥ ३०१॥
अत्यंत मलिन मन वाला इंद्र, मानो पहले से मरे हुओं को मारकर, अपना मंगल चाहता है।
English explanation
Indra, deeply impure in intent, seeks his own good by, as it were, killing those already dead.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मघवा | देवराज इंद्र | Indra, king of the gods |
| महा | अत्यंत | extremely |
| मलीन | मलिन मन वाला | impure in intent |
| मुए | पहले से मरे हुओं को | those already dead |
| मारि | मारकर | by killing |
| मंगल | अपना हित या कल्याण | his own good or welfare |
| चहत | चाहता है | desires |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- सोरठा 301
- स्रोत अभिलेख
- 2.301
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 595, 596
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