अयोध्याकाण्ड · दोहा 302 · दोहा/सोरठा
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.302 · पुस्तक पृ. 596, 597
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
भरत, जनक, मुनिजन, मंत्री और विवेकवान साधुओं को छोड़कर—
English explanation
Leaving aside Bharata, Janaka, the sages, ministers, and discerning holy people—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरतु | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| जनकु | राजा जनक, सीता के पिता | King Janaka, Sita’s father |
| मुनिजन | मुनि लोग | the sages |
| सचिव | मंत्री | ministers |
| साधु | संत; सज्जन | holy; virtuous people |
| सचेत | विवेकवान; सजग | discerning; aware |
| बिहाइ | छोड़कर | excepting; leaving aside |
2 लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।
देवताओं की माया बाकी सबको उनकी स्थिति के अनुरूप लगी, मानो उपयुक्त अवसर पा गई हो।
English explanation
The gods’ illusion affected all the others according to their condition, as though it had found a suitable opening.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लागि | प्रभावी हुई; लगी | took hold; affected |
| देवमाया | देवताओं की माया | the gods’ illusion |
| सबहि | सभी को | everyone |
| जथाजोगु | जिसके जैसा उपयुक्त था | as suited each person |
| जनु | मानो | as though |
| पाइ | अवसर पाकर | having found an opening |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 302
- स्रोत अभिलेख
- 2.302
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 596, 597
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