अयोध्याकाण्ड · दोहा 303 · दोहा/सोरठा
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.303 · पुस्तक पृ. 597, 598
भावार्थ और शब्दार्थ
1भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
भरत का निर्मल यश निर्मल चंद्रमा है, और सुबुद्धि चकोर की बालिका है।
English explanation
Bharata’s spotless fame is a spotless moon, and the discerning mind is a young female chakora bird.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| बिमल | निर्मल | spotless |
| जसु | यश | fame |
| बिमल | निर्मल | pure |
| बिधु | चंद्रमा | moon |
| सुमति | सुबुद्धि | discerning mind |
| चकोरकुमारि | चकोर की बालिका | young female chakora bird |
2 उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।
वह यशरूपी चंद्रमा निर्मल जनों के हृदयरूपी आकाश में उदित हुआ है, और सुबुद्धिरूपी चकोरी उसे एकटक निहार रही है।
English explanation
That moon of fame has risen in the sky of pure-hearted people’s hearts, and the discerning mind, like a young chakora, gazes steadily at it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उदित | उगा हुआ | risen |
| बिमल | निर्मल | pure-hearted |
| जन | जनों के | of people |
| हृदय | हृदयरूपी | formed by their hearts |
| नभ | आकाश में | in the sky |
| एकटक | एकटक | steadily |
| रही | रही है | continues |
| निहारि | निहारती | gazing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 303
- स्रोत अभिलेख
- 2.303
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 597, 598
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