अयोध्याकाण्ड · दोहा 300 · दोहा/सोरठा
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.3 · पुस्तक पृ. 594, 595
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
हितैषी, सुजान और उत्तम स्वामी से बहुत कहना बड़ा दोष है।
English explanation
Speaking at length to a caring, discerning, and noble master is a serious fault.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुह्रद | हितैषी | caring well-wisher |
| सुजान | भलीभाँति समझने वाले | discerning |
| सुसाहिबहि | उत्तम स्वामी को | to a noble master |
| बहुत | अधिक | at length |
| कहब | कहना | speaking |
| बड़ि | बड़ा | serious |
| खोरि | दोष | fault |
2 आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।
हे देव, अब मेरी सब बात सुधारकर मुझे आज्ञा दीजिए।
English explanation
O lord, now set all my affairs right and give me your command.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आयसु | आज्ञा | command |
| देइअ | दीजिए | please give |
| देव | हे प्रभु | O lord |
| अब | अब | now |
| सबइ | सभी बातें | all affairs |
| सुधारी | सुधारकर; सँवारकर | having set right |
| मोरि | मेरी | my |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 300
- स्रोत अभिलेख
- 2.3
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 594, 595
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