अयोध्याकाण्ड · दोहा 145 · दोहा/सोरठा
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.145 · पुस्तक पृ. 464, 465
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
‘जब नगर के व्याकुल स्त्री-पुरुष दौड़कर मुझसे पूछेंगे—’
English explanation
‘When the distraught men and women of the city run up and question me—’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धाइ | दौड़कर | running up |
| पूँछिहहिं | पूछेंगे | will ask |
| मोहि | मुझसे | me |
| जब | जब | when |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| नगर | नगर के | of the city |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
2 उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
‘तब मैं हृदय को वज्र के समान कठोर करके सबको उत्तर दूँगा।’
English explanation
‘Then I shall answer them all, hardening my heart like a thunderbolt.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उतरु | उत्तर | an answer |
| देब | दूँगा | shall give |
| मैं | मैं | I |
| सबहि | सभी को | to everyone |
| तब | तब | then |
| हृदयँ | हृदय में | in my heart |
| बज्रु | वज्र | a thunderbolt |
| बैठारि | स्थापित करके | having set firmly |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 145
- स्रोत अभिलेख
- 2.145
- सहायक विषय
- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और सर्वत्र शोक देखना
- मुद्रित पृष्ठ
- 464, 465
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।