अयोध्याकाण्ड · दोहा 146 · दोहा/सोरठा
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.146 · पुस्तक पृ. 465, 465
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
मेरा हृदय नहीं फटा, जैसे प्रिय जल से बिछुड़ते ही कीचड़ फट जाता है।
English explanation
My heart did not crack as mud does when parted from its beloved water.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ह्रदउ | हृदय | heart |
| न | नहीं | not |
| बिदरेउ | फटा | cracked |
| पंक | कीचड़ | mud |
| जिमि | जैसे | as |
| बिछुरत | बिछुड़ने पर | when parted from |
| प्रीतमु | प्रिय | beloved |
| नीरु | जल | water |
2 जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
मैं समझता हूँ कि विधाता ने मुझे यह शरीर यातना सहने के लिए दिया है।
English explanation
I believe the Creator gave me this body to endure torment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानत | समझता; जानता | believe; know |
| हौं | मैं हूँ | I do |
| मोहि | मुझे | to me |
| दीन्ह | दिया | gave |
| बिधि | विधाता | the Creator |
| यहु | यह | this |
| जातना | यातना के लिए | for torment |
| सरीरु | शरीर | body |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 146
- स्रोत अभिलेख
- 2.146
- सहायक विषय
- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और सर्वत्र शोक देखना
- मुद्रित पृष्ठ
- 465, 465
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।