अयोध्याकाण्ड · दोहा 147 · दोहा/सोरठा
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.147 · पुस्तक पृ. 465, 466
भावार्थ और शब्दार्थ
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1-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
मंत्री सुमंत्र के आगमन का समाचार सुनते ही पूरा रनिवास व्याकुल हो गया।
English explanation
On hearing of the minister Sumantra’s arrival, the entire queens’ household became distraught.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सचिव | मंत्री सुमंत्र का | the minister Sumantra’s |
| आगमनु | आगमन | arrival |
| सुनत | सुनते ही | upon hearing |
| सबु | पूरा | the entire |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| भयउ | हो गया | became |
| रनिवासु | रानियों का अंतःपुर और वहाँ के लोग | the queens’ quarters and household |
2 भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
उन्हें राजभवन भयंकर लगा, मानो वह प्रेतों का निवास हो।
English explanation
To him, the palace seemed terrifying, as though it were a dwelling of ghosts.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भवन | राजभवन | the palace |
| भयंकरु | भयावह | terrifying |
| लाग | लगा | seemed |
| तेहि | उन्हें; सुमंत्र को | to him; to Sumantra |
| मानहुँ | मानो | as though |
| प्रेत | प्रेतों का | of ghosts |
| निवासु | निवास | a dwelling |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 147
- स्रोत अभिलेख
- 2.147
- सहायक विषय
- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और सर्वत्र शोक देखना
- मुद्रित पृष्ठ
- 465, 466
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