अयोध्याकाण्ड · दोहा 139 · दोहा/सोरठा
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.139 · पुस्तक पृ. 459, 459
भावार्थ और शब्दार्थ
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1-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
क्षण-क्षण सीता और राम के चरणों को देखकर और अपने प्रति उनका प्रेम जानकर—
English explanation
Moment by moment, beholding Sita’s and Rama’s feet and recognizing their love for him—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छिनु | क्षण | moment |
| छिनु | क्षण; हर क्षण | moment; every moment |
| लखि | देखकर | beholding |
| सिय | सीता के | of Sita |
| राम | राम के | of Rama |
| पद | चरण | feet |
| जानि | जानकर | recognizing |
| आपु | अपने; स्वयं लक्ष्मण | himself, Lakshmana |
| पर | प्रति | toward |
| नेहु | प्रेम | love |
2 करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।
लक्ष्मण स्वप्न में भी भाइयों, माता, पिता और घर की ओर मन नहीं लगाते।
English explanation
Lakshmana does not turn his mind toward his brothers, mother, father, or home, even in dreams.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करत | करते; लगाते | directs; turns |
| न | नहीं | not |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in dreams |
| लखनु | लक्ष्मण | Lakshmana, Rama’s brother |
| चितु | मन; ध्यान | mind; attention |
| बंधु | भाइयों की ओर | toward his brothers |
| मातु | माता की ओर | toward his mother |
| पितु | पिता की ओर | toward his father |
| गेहु | घर की ओर | toward home |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 139
- स्रोत अभिलेख
- 2.139
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 459, 459
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