अयोध्याकाण्ड · दोहा 140 · दोहा/सोरठा
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.14 · पुस्तक पृ. 460, 460
भावार्थ और शब्दार्थ
1-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
राम का स्मरण करते ही भक्त विषयों के सुख-विलास को तिनके के समान तुच्छ समझकर छोड़ देते हैं।
English explanation
Remembering Rama, devotees abandon sensual pleasures as though they were mere straw.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरत | स्मरण करते हुए | remembering |
| रामहि | राम को | Rama |
| तजहिं | त्याग देते हैं | abandon |
| जन | भक्तजन | devotees |
| तृन | तिनके | straw |
| सम | के समान | like |
| बिषय | इंद्रिय-विषयों का | sensual |
| बिलासु | सुख-विलास | pleasures |
2 रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
सीता राम की प्रिया और जगत की माता हैं; उनके ऐसे अनासक्त रहने में कोई आश्चर्य नहीं है।
English explanation
Sita is Rama’s beloved and the mother of the world; there is nothing surprising in her freedom from attachment to such pleasures.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामप्रिया | राम की प्रिया | Rama’s beloved |
| जग | जगत की | of the world |
| जननि | माता | mother |
| सिय | सीता | Sita |
| कछु | कुछ भी | any |
| न | नहीं | not |
| आचरजु | आश्चर्य | surprise |
| तासु | उनके इस व्यवहार में | in this conduct of hers |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 140
- स्रोत अभिलेख
- 2.14
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 460, 460
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।